Friday, October 24, 2008

सभी जमाती भाइयों को गौतम यादव नाम के इस नाचीज का सलाम, बहुत दिनों बाद ब्लॉग लिख रहा हूं,और इस ब्लॉग पर तो शायद पहली बार......दोस्तों हमने पढ़ने के दौरान ये ब्लॉग बनाया था और यो सोचा था कि लगातार कुछ ना कुछ लिखकर और अपने दिल के उद्गार लिख कर इस ब्लॉग को समृद्ध बनाएंगे, लेकिन देखने में आ रहा हैकि ना तो मैं और ना हीं आप लोगों में से किसी ने इस पर लिखने की जहमत उठायी.

कोई बात नहीं कि हम अपनी नौकरी और अपने जीवन में इतने व्यवस्त हो गए हों कि आपसी विचार साझा करने का हमारे पास बचा ये एकमात्र मंच भी हम ठीक ढंग से उपयोग नहीं कर पाए।लेकिन हम अब भी एक नयी शुरुआत कर सकते हैं, और इस ब्लॉग को नई जान दे सकते हैं............

तो दोस्तों शुरु हो जाइये...... कुछ लिखिये, कुछ कहिए, ताकि अपनी ये जमात वाकई में एक जमात के रुप में संगठित रह सके........ और हम लोगों में 'हम' नाम का ये सामूहिक तत्व बचा रह सके

Wednesday, October 15, 2008

हिंसा के लिए जिम्मेदार राजनीतिक दल

आज भारत के हर एक कोने में नफरत की आग धधक रही है। चाहे ये आग आतंक के खिलाफ हो या धार्मिक हिंसा के खिलाफ हो या आजादी की मांग हो । इन सभी समस्याओं पर अगर सही तरीके से विचार किया जाए तो समाधान पाया जा सकता है। लेकिन राजनीतिक दल अपनी अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने में लगे हुए है। आज भारत में धमाके और धार्मिक हिंसा के खिलाफ राजनीतिक दल धर्म के आधार पर बंटे हुए दिखाई दे रहे है। चाहे वे सेकुलर कांग्रेस और क्षेत्रिय दल हो या देश को एकता में बांधने का नारा देने वाली भाजपा हो । ये दोनों राष्ट्रीय पार्टियां भारत में हो रही हिंसा पर विचार की बजाय राजनीति कर रही है। एक मुस्लिमों को अपने पक्ष में करने की कोशिश में लगा हुआ है। तो दूसरा जो खुद को देशभक्त कहता है बजरंग दल जैसे संगठनों का पक्ष ले रहा है। इस स्थिति में देश की जनता को अपनी जाति, धर्म से ऊपर उठ कर देश के बारे में सोचना होगा। नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब एक आमने सामने घर होने पर भी एक दूसरे को देखना तक पसंद नहीं करेंगे॥ और मौका पड़ने पर मदद की बात तो दूर । कोई देखने तक नहीं आएगा।

Monday, May 26, 2008

मसि कागद छूयो नही......लिपटे रहत भुजंग

आज ऋषि भाई की "परेशानी "पढ़ रहा था। रात भर वे रोटी के बारे में सोचते रहे। मैं भी बड़े दिनों बाद लिख रहा हूँ। कम्पूटर के जमाने में कलम का कोई काम तो होता नही ईसलिए यह भी नही कह सकता की यार कलम नही चल रही है। पर कभी कभी ये सोचता हूँ की जब कबीर ने ये बात कही होगी तो तो वो अपने समय से कितने आगे चल रहे थे। क्या उस समय किसी ने यह सोचा रहा होगा की एक दिन ऐसा आएगा की कोई भी कलम नही छूयेगा ? लेकिन भाई वो दिन तो आना ही था। सो आ गया । अब ये मत सोच लेना की अगर सब लोग कलम नही चूयेंगे और कागद पर नही लिखकर कंप्युटर पर लिखेंगे तो वे कबीर हो जायेंगे, तो उनसे बड़ा बुद्धी का भसुर कोई नही होगा। तो चलो भईया, रात बहुत हो गई है, हमे भी अब घर janaa है। तो हे भुजंग महोदय, अब आप भी अपना समय बरबाद मत कीजिये और इस घतिअतम लेख को पढ़ना छोडिये.

Wednesday, March 5, 2008

टी वी में क्या कुछ होता रहता है। कुछ दिन पहले पुण्य प्रसून जी सहारा को बेसहारा कर गए। समझ में नही आता की आख़िर एक संगठन को उंचाईयों पर पहुँचने वाला आदमी कैसे उसे छोड़ सकता है। यदि ऐसा हो की एक बड़े और सम्मानित पत्रकार को इस तरह से कोई संगठन छोड़ना पड़े तो हम लोंगो जैसे नए नवेले पत्रकारों का क्या हाल हाल होगा? हमने तो सोचा था की पत्रकारिता में जा के जम के लिखेंगे और ग़लत बातों का विरोध कर सकेंगे , पर यहाँ तो हाल दूसरा ही दिखता है। हर जगह गुट बने हुए हैं। यदि आप किसी गुट के सदस्य नहीं हैं तो आपका जीना मुहाल किया जा सकता है। तो भाई, टी वी में अगर जाना है तो अभी से सीख लो, की किस गुट में शामिल होना है। अब कल ही एक समाचार मिला की वीर संघवी साहब को उनके ही संघठन के लोंगो ने पीट दिया। मैं तो सुन के दंग रह गया।मैं सोच रहा था की पत्रकारिता में आ के सही कर रहा हूँ की ग़लत? क्या वाकई में हमारे जैसे पत्रकार आज की "पत्रकारिता" कर पाएंगे? हमने क्या सोच कर भारतीय जन संचार संस्थान में दाखिला लिया था। और आज जब हम मेन स्ट्रीम मीडिया में घुसने ही वालें हैं तो हमें ऐसे ऐसे समाचार सुनने को मिल रहे हैं की दिल बैठ बैठ जाता है। हमारे सीनियर ( टी वी वाले ) जब भी हमें मिलते हैं तो अपनी जिंदगी को कोसते ही मिलते हैं। कहते हैं की स्साला रात भर ड्यूटी करो और दिन भर सोते रहो। सारी सोशल लाइफ ख़राब होकर रह गई है। हमें तो भाई नौकरी भी चाहिए और जिंदगी का सुकून भी। देखतें हैं, दोनों में से क्या मिलता है!

Saturday, March 1, 2008

सहायता करें

अपनी जमात के भईयों , आज मेरे सामने एक घम्भीर समस्या आ खड़ी हुई है। मैंने एक ब्लॉग लिखा था । जब उसे पोस्ट किया तो वो स्साला अजीब सा आ रहा है। यदि कोई मेरी मदद कर सकता है तो कृपया बताये।

Friday, February 22, 2008

अपने प्यार को एक नाम दो

प्यार करने वाले एक तरफा ही होते है,लोग जो प्यार करते है एक दुसरे के सिवाय किसी को नही देखते है । कभी कभी ऐसा हो जाता है कि सामने वाला सब समझते हुए और बेहतर कि तलाश मे हो । ऐसे मे घबराना नही चाहिए बस अपनी दावेदारी बनाये रखनी चाहिए । लेकिन ज्यादा इंतजार भी आपको तनाव मे ला सकता है । दावेदारी को मुकम्मल नाम के साथ जिया भी जाना चाहिए। मैं उन सभी की तरफ इशारा कर रहा ह जो प्यार तो कर लेते है लेकिन उसे जी नही पाते है जो मज़ा प्यार को पाने मे है उससे ज्यादा मज़ा उसे बिना पाए आसू बहाने मे है ।क्यो की यहाँ करने के लिए कुछ नही होता सिवाय रोने के । रोना दुनिया का सबसे नेचुरल काम है । जब जन्म होता है तो बच्चा सबसे पहले रोता ही है इसीलिए रोने से बगैर परहेज़ किए हर बात पर बेधड़क रोना चाहिए । साथ ही रोने का कारन और नाम स्पष्टहों जरूरी है।

Thursday, February 21, 2008

आज सुबह मैं बहुत खुश था...............

रात को बहुत अच्छी नीद आयी थी। सुबह का अख़बार उठाया तो सीधे बिजनेस के पन्ने पर नज़र डाली। भाई डालना ही पड़ता है,इकोनोमी बूम के ज़माने में यदि शेयर मैं पैसा न लगाओ तो लोग - बाग बेवकूफ समझते हैं। मैंने भी लगा रखा है। वैसे सही कहूँ तो शेयर बाज़ार की कोई समझ मुझे है नही,मैं तो बस यूं हीं फेंकता रहता हूँ. वित्त मंत्री का बयान आया था की हमारी अर्थव्यवस्था, १०% की गति से विकास करती रहेगी। पढ़ के बहुत अच्छा लगा। सेंसेक्स भी बौराए सांड की तरह ऊपर ही भागा जा रहा था। अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशों की भविष्य वाणियाँ सत्य सिद्ध प्रतीत होतीं लग रहीं थीं। ऐसे में कोई क्यों न बौरा जाए!


कनक कनक ते सौ गुनी , मादकता अधिकाय


या खाए बौराए जग, वा पाए बौराए


तो साहब पाने के लिए था शेयर । रिलायंस और बहुत से आई पी ओ .क्या khareeden ?कहाँ पैसा लगाएं ? कौन सा शेयर लें? सब लोग इसी में व्यस्त थे। हम भी इसी लाइन में लगे थे! लेकिन मन में कहीं एक बेचैनी थी। जो इस पार से उस पार झूलती रहती थी। अख़बार देखकर और प्रधानमंत्री के बयान सुन सुनकर ऐसा लगता था की देश बहुत तेज़ी से ऊपर जा रहा है,सड़क पर निकलता था तो लोंगो को कूडा बीनते देख ,यह भ्रम टूट जाता था।


खैर.... बड़े बड़े देश में छोटी छोटीतें तो होती ही रहतीं हैं।


सुबह सुबह ही रिलायंस के १५ शेयर मिलने की सूचना मिली थी।